रविवार, 1 अक्टूबर 2023

शिव चालीसा हिंदी में लिरिक्स: सोमवार विशेष

 हिंदू धर्म में सप्ताह के सभी दिन किसी न किसी भगवान को समर्पित है। सोमवार विशेष रूप से महादेव को समर्पित है। इस दिन शिव जी की पूजा आराधना की जाती है। वैसे हमारे शिव जी बहुत भोले हैं, वे एक लोटा जल से ही प्रसन्न हो जाते हैं। परंतु भक्तों का प्रेम और सच्चा भाव देखकर सब कुछ स्वीकार कर लेते हैं। इस आर्टिकल मे शिव जी को अत्यंत प्रिय शिव चालीसा प्रस्तुत की गई है।सोमवार को इसका पाठ अवश्य करें।

                    ।।  शिव चालीसा ।।

          

                      ।। दोहा ।।

      जय गणेश गिरजा सेवन, मंगल मूल सुजान। 

      कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान।।


                           ।।चौपाई।।


जय गिरजा पति दीन दयाला।
सदा करत सन्तन प्रतिपाला।।
भाल चंद्रमा सोहत नीके।
कानन कुण्डल नागफनी के।।

Jai girjapati din dayala
Sada karta santan pratipala
Bhal chandrma sohat nike
Kanan kundal nagphani ke

अंग गौर शिर गंग बहाये।
मुण्डमाल तन क्षार लगाये।।
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे।
छवि को देखि नाग मन मोहे।।

Ang gaur shir gang bahaye
Mundmal tan chhar lagaye
Vastra khal baghambar sohe
Chavi ko dekh naag mann mohe

मैना मातु की हवै दुलारी। 
बाम अंग सोहत छवि न्यारी।।
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी।
करत सदा शत्रुन क्षयकारी।।

Maina maatu ki have dulari
Baam ang sohat chavi nyari
Kar trishul sohat chavi bhari
Karat sada satrun chaykari


नंदी गणेश सोहे तहँ कैसे।
सागर मध्य कमल हैं जैसे।।
कार्तिक श्याम और गणराऊ।
या छवि को कहि जात न काऊ।।

Nandi Ganesh sohe tahe kaise
Sagar madya kamal hai jaise
Kartik shyam aur ganrau
Ya chavi ko kahe jaat na kau

देवन जबहिं जाय पुकारा। 
तब ही दुख प्रभु आप निवारा।।
किया उपद्रव तारक भारी। 
देवन सब मिलि तुम्ही जुहारी।।

Devan javahi jaye pukara
Tab hi dukh prabhu aap nibvara
Kiya upadrav tarak bhari
Devan sab mil tumahi juhari

तुरंत षडासन आप पठायउ।
लवनिमेष महँ मारि गिरायउ।।
आप जलंधर असुर संहारा।
सुयश तुम्हार विदित संसारा।।

Turant shadashan aap pathayu
Labnimesh mah maari girayu
Aap jalndhar asur sanghara
Suyash tumhar vidit sansara



Publicatio संग युद्ध मचाई।
सबहिं कृपा कर लीन वचाई।।
किया तपहिं भागीरथ भारी।
पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी।।

दानिन मँह तुम सम कोऊ नाहिं।
सेवक स्तुति करति सदाहिं।।
वेद माहि महिमा तुम गाई।
अकथ अनादि भेद नही पाई।।

प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला। 
जरत सुरासुर भेद विहाला।।
कीन्ही दया तहं करी सहाई।
नीलकण्ठ तब नाम कहाई।।

पूजन रामचंद्र जब कीन्हा। 
जीत के लंक विभीषण दीन्हा।।
सहस कमल में हो रहे धारी।
कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी।।

एक कमल प्रभु राखेउ जोई।
कमल नयन पूजन चहं सोई।।
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर।
भए प्रसन्न दिए इच्छित वर।।

जय जय जय अनंत अविनाशी।
करत कृपा सब के घटवासी।।
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै।
भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै।।

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो 
येहि अवसर मोहि आन उवारो।।
लै त्रिशूल शत्रुन को मारौ।
संकट ते मोहि आन उबारौ।।

माता-पिता भ्राता सब होई।
संकट में पूछति नहिं कोई।।
स्वामी एक है आस तुम्हारी।
आय हरहु मम संकट भारी।।

धन निर्धन को देत सदाहीं।
जो कोई चाहें वो फल पाहीं।।
स्तुति केहि विधि करें तुम्हारी।
क्षमहु नाथ अब चूक हमारी।।

शंकर हो संकट के नाशन ।
मंगल कारण विघ्न विनाशन।।
योगी यति  मुनि ध्यान लगावैं।
शारदीय नारद शीश नवावैं।।

नमो नमो जय नमः शिवाय।
सुर ब्रह्मादि पार न पाय।।
जो यह पाठ करे मन लगाई।
ता पर होत है शम्भु सहाई।।

ऋनियाँ जो कोई हो अधिकारी।
पाठ करे सो पावन हारी।।
पुत्र होन कर इच्छा जोई।
निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई।।

पंडित त्रयोदशी को लावे।
ध्यानपूर्वक हवन करावे।।
त्रयोदशी व्रत करे हमेशा।
ताके तन नही रहे कलेशा।।

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे।
शंकर सम्मुख पाठ सुनावे।।
जन्म जन्म के पाप नसावे। 
अंत धाम शिवपुर में पावे।।

कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी।
जानि सकल दुख हरहु हमारी।।












 


 

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